श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) | भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने शनिवार को एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की, जब स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण किया और यह पृथ्वी की कक्षा में रॉकेट स्थापित करने वाली पहली भारतीय निजी कंपनी बन गई। यह प्रक्षेपण भारत की व्यावसायिक अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं में एक नए अध्याय की शुरुआत है और देश को निजी ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
मिशन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से दोपहर 12:05 बजे (भारतीय समयानुसार) लॉन्च किया गया। महज 16 मिनट के भीतर सात मंज़िला ऊंचा यह प्रक्षेपण यान लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक पहुंच गया।
सफल मिशन के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि “विक्रम-1 टेस्ट फ्लाइट-1 कक्षा में पहुंच गया है। इतिहास रच दिया गया है।”
भारत एलीट वैश्विक क्लब में शामिल
विक्रम-1 की सफलता के साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद केवल तीसरा देश बन गया है, जहां किसी निजी कंपनी ने स्वतंत्र रूप से ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च हासिल किया है।
यह मिशन भारत के तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष तंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, जिसे 2020 में निजी भागीदारी के लिए खोला गया था।
‘अंतरिक्ष के लिए कैब सर्विस’
स्काईरूट एयरोस्पेस का लक्ष्य है कि जिसे वह “अंतरिक्ष के लिए कैब सर्विस” कहती है, उसके जरिए सैटेलाइट लॉन्च में क्रांति लाई जाए।
बड़े रॉकेटों पर लॉन्च के अवसर के लिए महीनों या वर्षों इंतज़ार करने के बजाय, सैटेलाइट ऑपरेटर अपनी विशिष्ट कक्षीय जरूरतों के अनुसार समर्पित मिशन बुक कर सकेंगे।
स्काईरूट के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना ने इस अवधारणा की तुलना सार्वजनिक परिवहन का इंतज़ार करने के बजाय टैक्सी बुक करने से की।

उन्होंने समझाया, “अगर आपको किसी दोस्त के घर जाना है, तो आप ट्रेन का इंतज़ार करने के बजाय कैब बुक करते हैं। हम चाहते हैं कि सैटेलाइट ऑपरेटरों को अंतरिक्ष तक पहुंचने में भी वही लचीलापन मिले।”
छोटे सैटेलाइट लॉन्च के लिए डिज़ाइन
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर बना विक्रम-1 350 किलोग्राम तक के पेलोड को कक्षा में ले जाने के लिए विकसित किया गया है।
यह रॉकेट संचार, पृथ्वी अवलोकन, नेविगेशन, कृषि, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा में इस्तेमाल होने वाले छोटे सैटेलाइट्स के तेजी से बढ़ते वैश्विक बाज़ार के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है।
मिशन ‘आगमन’ में छह पेलोड
“आगमन” नामक इस पहले ऑर्बिटल मिशन ने छह पेलोड सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किए।
इनमें वैज्ञानिक उपकरण, एक पृथ्वी अवलोकन कैमरा, भविष्य में अंतरिक्ष मलबा हटाने के लिए डिज़ाइन किया गया एक रोबोटिक आर्म और एक जर्मन कंपनी सहित घरेलू व अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के सैटेलाइट शामिल थे।
प्रतीकात्मक पेलोड्स में शामिल थे:
- प्रयोगशाला में विकसित हीरों से बना एक कमल, जिसका नाम कॉस्मिक ब्लूम है
- एक छोटा सोने का रॉकेट, जिसमें डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और नोबेल विजेता सर सी.वी. रमन को समर्पित सूक्ष्म मूर्तियां थीं
कंपनी ने कहा कि इन पेलोड्स का उद्देश्य भारत की वैज्ञानिक विरासत और नवाचार का सम्मान करना था।
इसरो इंजीनियरों से स्पेस यूनिकॉर्न तक
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी।
2020 में भारत द्वारा अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद स्काईरूट तेजी से बढ़ी और हाल ही में 1.1 अरब डॉलर से अधिक का मूल्यांकन पार करते हुए भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन गई।
कंपनी ने इससे पहले 2022 में भारत का पहला निजी तौर पर विकसित सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर सुर्खियां बटोरी थीं।
अगले साल से व्यावसायिक लॉन्च की योजना
शनिवार का मिशन कंपनी द्वारा 2027 में व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं शुरू करने से पहले नियोजित दो टेस्ट फ्लाइट्स में से पहला है।
स्काईरूट का कहना है कि उसकी हैदराबाद स्थित मैन्युफैक्चरिंग इकाई में पहले से ही हर महीने एक रॉकेट बनाने की क्षमता है, जिससे वह दुनिया भर के ग्राहकों को सेवा दे सकती है।
कंपनी का मानना है कि उसका लगभग 80% भविष्य का कारोबार अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट ऑपरेटरों से आएगा।
विक्रम-1 के सफल मिशन को एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, जो वैश्विक व्यावसायिक अंतरिक्ष उद्योग में भारत की स्थिति मजबूत करती है और इसरो के महत्वाकांक्षी भविष्य के मिशनों के साथ-साथ निजी नवाचार के लिए नए अवसर खोलती है।



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