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रविवार, 1 नवंबर 2026
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8.3 लाख का 'नवरात्रि बैग'! फेंडी के मिरर-वर्क हैंडबैग पर भड़के हर्ष गोयनका और किरण मजूमदार-शॉ

इटालियन लग्जरी ब्रांड के शीशे और मोतियों की कढ़ाई वाले बैग की तुलना गुजरात के बाजारों में मिलने वाले पारंपरिक बैग से हो रही है। भारतीय कारीगरों को श्रेय न देने पर सवाल उठे।

8.3 लाख का 'नवरात्रि बैग'! फेंडी के मिरर-वर्क हैंडबैग पर भड़के हर्ष गोयनका और किरण मजूमदार-शॉ
प्रतीकात्मक तस्वीर: कच्छ-सिंध क्षेत्र की पारंपरिक शीशा-कढ़ाई — फोटो: Hiart / Wikimedia Commons (CC0)

नई दिल्ली | नवरात्रि से ठीक पहले सोशल मीडिया पर एक महंगे हैंडबैग ने बहस छेड़ दी है। इटली के लग्जरी फैशन ब्रांड फेंडी का एक बैग, जिसकी कीमत करीब 8.3 लाख रुपये बताई जा रही है, भारतीय यूजर्स के निशाने पर है। वजह है इसका डिजाइन, जो लोगों को गरबा और नवरात्रि के मौके पर बाजारों में मिलने वाले रंग-बिरंगे शीशे वाले बैग की याद दिला रहा है।

क्या है बैग में खास

रिपोर्ट्स के अनुसार यह बैग ब्रांड की 'बैगेट' सीरीज का मल्टीकलर एडिशन है।

  • हाथ से की गई कढ़ाई
  • करीब 39,500 मोती (बीड्स)
  • लगभग 475 छोटे शीशे
  • बनाने में 138 घंटे से ज्यादा का काम

उद्योगपतियों ने उठाए सवाल

आरपीजी समूह के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने इस बैग पर तंज कसते हुए कहा कि जो डिजाइन गुजरात की गलियों में करीब 500 रुपये में मिल जाता है, उसके लिए लाखों रुपये वसूले जा रहे हैं और भारतीय कारीगरों को कोई श्रेय नहीं दिया गया।

बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ ने भी इसे भारतीय पारंपरिक शिल्प को बिना श्रेय दिए लग्जरी के रूप में दोबारा पेश करने का मामला बताया। उनके मुताबिक इससे असली विरासत और उसे सहेजने वाले कारीगरों की पहचान कमजोर होती है।

यूजर्स बंटे

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। कुछ लोगों ने ब्रांड के बहिष्कार की बात कही, तो कुछ ने इसे डिजाइन की नकल बताते हुए कानूनी कदम उठाने का सुझाव दिया। वहीं कई यूजर्स का कहना था कि भारत को अपने मजबूत वैश्विक फैशन ब्रांड खड़े करने चाहिए। एक यूजर ने सांस्कृतिक स्वामित्व की बहस से आगे बढ़कर पारंपरिक शिल्प के पेटेंट जैसी कानूनी सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

फिलहाल इस विवाद पर फेंडी की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। गौरतलब है कि शीशे और मोतियों की कढ़ाई गुजरात और राजस्थान समेत पश्चिमी भारत की पुरानी लोक कला मानी जाती है, जो नवरात्रि के परिधानों और सजावटी सामान में खूब दिखाई देती है। यह विवाद एक बार फिर इस सवाल को सामने लाया है कि वैश्विक फैशन में पारंपरिक शिल्प के इस्तेमाल पर मूल कारीगरों को श्रेय और लाभ कैसे मिले।

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वायरल डेस्क · संपादकीय डेस्क

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