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गुरुवार, 17 सितंबर 2026
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पितृ पक्ष 2026: 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या; जानें जरूरी नियम

पंचांग के अनुसार श्राद्ध पक्ष की प्रतिपदा 27 सितंबर को है। अमावस्या पर उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी पुण्यतिथि ज्ञात न हो।

पितृ पक्ष 2026: 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या; जानें जरूरी नियम
महालया पर नदी घाट पर तर्पण करते श्रद्धालु (फाइल फोटो) — फोटो: Goutam1962 / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

आगरा | पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का पखवाड़ा पितृ पक्ष इस बार सितंबर के आखिरी सप्ताह में शुरू होगा। पंचांगों के अनुसार 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध होगा और 27 सितंबर, रविवार से प्रतिपदा श्राद्ध के साथ पितृ पक्ष औपचारिक रूप से आरंभ होगा। इसका समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा, जिसे महालया अमावस्या भी कहा जाता है।

क्या है पितृ पक्ष

हिंदू परंपरा में भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के इन दिनों को पितरों को समर्पित माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंडदान और दान पूर्वजों तक पहुंचता है। आमतौर पर जिस तिथि को परिजन का देहांत हुआ हो, पितृ पक्ष की उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

10 अक्टूबर को पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन मानी जाती है। इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारण निर्धारित तिथि पर न हो पाया हो। इसके अगले दिन, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाएगी। बंगाल में इसी दिन महालया के साथ दुर्गा पूजा की उलटी गिनती शुरू होती है।

परंपरा से जुड़ी मुख्य बातें

  • श्राद्ध कर्म आमतौर पर दोपहर के समय, कुतुप और रौहिण मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना जाता है
  • तर्पण में जल, काले तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है
  • ब्राह्मण भोजन के साथ गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भी भोजन निकालने की परंपरा है
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दान देना पुण्यकारी माना जाता है
  • परंपरागत रूप से इन दिनों गृह प्रवेश, नई खरीदारी और मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है

गया, वाराणसी और हरिद्वार में जुटती है भीड़

पितृ पक्ष के दौरान बिहार के गया, उत्तर प्रदेश के वाराणसी और प्रयागराज तथा उत्तराखंड के हरिद्वार जैसे तीर्थों पर पिंडदान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। वहां जाने की योजना बना रहे लोग पहले से ठहरने और यात्रा की व्यवस्था कर लें। घाटों पर स्नान और तर्पण के समय नदी के तेज बहाव को लेकर प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।

ध्यान रहे कि तिथियों का प्रारंभ और समाप्ति समय शहर के सूर्योदय के अनुसार बदल सकता है। इसलिए अपने परिजन की श्राद्ध तिथि तय करने से पहले स्थानीय पंचांग या पुरोहित से जानकारी अवश्य लें।

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लाइफस्टाइल डेस्क · संपादकीय डेस्क

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