नई दिल्ली | अमेरिकी अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स ने अपने विशाल स्टारशिप रॉकेट की 14वीं परीक्षण उड़ान का ब्योरा जारी किया है। यह स्टारशिप की पहली ऐसी उड़ान होगी, जिसमें यान पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने का प्रयास करेगा। अब तक के सभी परीक्षण सब-ऑर्बिटल यानी कक्षा से नीचे के प्रक्षेप-पथ पर हुए थे। कंपनी के अनुसार लॉन्च मंगलवार, 22 सितंबर से पहले नहीं होगा और यह नियामकीय मंजूरी पर निर्भर करेगा।
कब और कहां से लॉन्च
उड़ान टेक्सास स्थित स्टारबेस से होगी। स्थानीय समय के मुताबिक सुबह 7:15 बजे से 75 मिनट की लॉन्च विंडो खुलेगी, जो भारतीय समयानुसार शाम करीब 5:45 बजे बैठती है। इस मिशन में तीसरी पीढ़ी (ब्लॉक 3) का सुपर हेवी बूस्टर B21 और शिप 41 इस्तेमाल होंगे। उड़ान से पहले शिप और बूस्टर के इंजनों के स्टैटिक फायर परीक्षण अगस्त में पूरे किए गए थे।
26 स्टारलिंक V3 उपग्रह होंगे सवार
इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि स्टारशिप पहली बार स्टारलिंक के नई पीढ़ी के V3 उपग्रहों को कक्षा में छोड़ेगा। स्पेसएक्स के मुताबिक:
- मिशन में कुल 26 स्टारलिंक V3 उपग्रह भेजे जाएंगे
- हर V3 उपग्रह नेटवर्क में करीब 1 टेराबिट प्रति सेकंड क्षमता जोड़ेगा
- इस एक लॉन्च से कुल 26 Tbps क्षमता जुड़ेगी, जो फाल्कन 9 से होने वाले एक सामान्य स्टारलिंक लॉन्च की तुलना में लगभग 10 गुना है
- कुछ उपग्रहों में कैमरे लगे हैं, जो शिप की हीट शील्ड की तस्वीरें लेंगे
करीब 10 घंटे का मिशन
योजना के अनुसार शिप लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर करीब छह बार पृथ्वी की परिक्रमा करेगा। उपग्रहों को छोड़ने के बाद अंतरिक्ष में एक रैप्टर इंजन चलाकर डीऑर्बिट बर्न किया जाएगा। इसके बाद नियंत्रित तरीके से वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर यान चिली के पश्चिम में प्रशांत महासागर में उतरेगा। वहीं, सुपर हेवी बूस्टर मैक्सिको की खाड़ी में समुद्र में लैंडिंग करेगा। कंपनी ने बताया है कि फ्लाइट 13 के बाद सामने आई दिक्कतों को देखते हुए बूस्टर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में बदलाव किए गए हैं।
क्यों अहम है यह उड़ान
स्टारशिप को भविष्य में चांद और मंगल अभियानों के साथ-साथ भारी उपग्रहों को कम लागत में अंतरिक्ष तक पहुंचाने के लिए तैयार किया जा रहा है। कक्षा तक सफल उड़ान और उपग्रहों की तैनाती इसे प्रायोगिक दौर से व्यावहारिक इस्तेमाल की ओर ले जाने वाला बड़ा कदम होगी। स्टारलिंक की क्षमता बढ़ने का असर उन देशों पर भी पड़ सकता है, जहां सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू हो रही हैं। हालांकि, अंतरिक्ष परीक्षणों में तकनीकी कारणों या मौसम की वजह से लॉन्च की तारीख आगे खिसकना आम बात है।


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