श्रीहरिकोटा | भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का अर्थ ऑब्जर्वेशन उपग्रह EOS-05, जिसे GISAT-1A भी कहा जाता है, अपनी निर्धारित भू-समकालिक कक्षा में पहुंच गया है। 4 सितंबर को तड़के 2 बजकर 55 मिनट पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से GSLV-F17 रॉकेट ने इसे उड़ान भरी थी और उपग्रह को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित किया था।
तीन चरणों में कक्षा का विस्तार
लॉन्च के बाद 5 और 6 सितंबर को उपग्रह के लिक्विड एपोजी मोटर को दो बार चलाया गया। 7 सितंबर को तीसरा और अंतिम कक्षा-उन्नयन अभ्यास पूरा हुआ, जिसके बाद उपग्रह धरती से करीब 36 हजार किलोमीटर ऊंचाई वाली अपनी लक्षित कक्षा तक पहुंच गया। यह उपग्रह अब तक GSLV से छोड़ा गया सबसे भारी उपग्रह बताया गया है।
सात महीने बाद राहत भरी सफलता
यह मिशन इसरो के लिए कई मायनों में अहम रहा। 12 जनवरी को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन की विफलता के बाद संगठन ने करीब सात महीने तक कोई लॉन्च नहीं किया था। ऐसे में GSLV-F17 की सफलता को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की मजबूत वापसी के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि पर वैज्ञानिकों को बधाई दी।
EOS-05 दरअसल GISAT-1 की जगह लेगा, जो 2021 में लॉन्च के दौरान गड़बड़ी के कारण खो गया था।
आपदा निगरानी में मिलेगी मदद
भू-स्थिर कक्षा में रहने के कारण यह उपग्रह भारतीय उपमहाद्वीप पर लगातार नजर रख सकेगा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह चुने हुए क्षेत्रों की तस्वीरें हर 5 मिनट में और पूरे भारतीय भू-भाग की तस्वीरें हर 30 मिनट में ले सकता है। इसके प्रमुख उपयोग इस प्रकार हैं:
- चक्रवात, बाढ़, बादल फटने और जंगल की आग जैसी आपदाओं की त्वरित निगरानी
- कृषि और वन क्षेत्र में होने वाले बदलावों का आकलन
- सुरक्षा से जुड़ी निगरानी
उपग्रह में मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग की क्षमता वाला टेलीस्कोप लगा है, जो दृश्य, नियर-इन्फ्रारेड और शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड बैंड में तस्वीरें लेता है। इसका नियोजित मिशन जीवन 10 वर्ष है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून और चक्रवात के मौसम में ऐसे उपग्रह से मिलने वाला लगभग रियल-टाइम डेटा राहत एजेंसियों और राज्य सरकारों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है।


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