नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें कांग्रेस पार्टी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस्तीफे की मांग करते हुए उन पर सैन्य अभियान के दौरान हुए हताहतों को लेकर संसद को गुमराह करने का आरोप लगाया है।
यह विवाद तब जोर पकड़ने लगा जब हाल ही में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए छह सैनिकों के नाम अंकित किए गए। इस घटनाक्रम ने विपक्ष की ओर से तीखी आलोचना को जन्म दिया है, जिसका दावा है कि सरकार के पहले के बयान पूरी सच्चाई को नहीं दर्शाते।
कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बी. के. हरिप्रसाद ने आरोप लगाया कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किसी भी भारतीय सैनिक की मौत नहीं हुई। हालांकि, छह शहीदों की सार्वजनिक स्वीकृति ने अब घटनाओं के सरकारी संस्करण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हरिप्रसाद ने कहा कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले पर संसद को अधूरी या भ्रामक जानकारी दी गई, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। कांग्रेस नेता के अनुसार, देश पारदर्शिता का हकदार है, और शहीद सैनिकों के परिवार सरकार से पूरी ईमानदारी के हकदार हैं।
कांग्रेस पार्टी ने तर्क दिया है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर विरोधाभासी बयान जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं और सैन्य खुलासों में पारदर्शिता को लेकर चिंता पैदा करते हैं। विपक्ष अब सियासी जवाबदेही की मांग कर रहा है और उसने रक्षा मंत्री के इस्तीफे की अपनी मांग तेज कर दी है।
इस बीच, सरकार और रक्षा मंत्रालय ने इन आरोपों को भ्रामक और राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि छह सैनिकों के बलिदान को जनता से कभी नहीं छिपाया गया।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 11 मई 2025 को हुई एक आधिकारिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने छह शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी थी और उनके सर्वोच्च बलिदान को स्वीकार किया था। मंत्रालय ने आगे कहा कि इन सभी छह कर्मियों को बाद में 2025 में वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, और वे ब्योरे आधिकारिक माध्यमों से सार्वजनिक रूप से जारी किए गए थे।
सरकारी सूत्रों ने यह भी जोर दिया कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर नामों का अंकित होना एक औपचारिक स्मृति प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे हताहतों के नए खुलासे के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।
ऑपरेशन सिंदूर भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया एक बड़ा सैन्य अभियान था और यह चार दिनों तक चला। भारतीय अधिकारियों ने इस अभियान को रणनीतिक रूप से सफल बताया था, लेकिन हताहतों की बहस ने अब ध्यान सैन्य उपलब्धि से हटाकर सियासी टकराव पर केंद्रित कर दिया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है, खासकर तब जब विपक्ष इस मामले को संसद में आक्रामक रूप से उठाने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, सरकार यह कहती रही है कि जानकारी छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया गया और सैनिकों के बलिदान को विधिवत स्वीकार किया गया।
फिलहाल, ऑपरेशन सिंदूर एक गरमागरम सियासी जंग का केंद्र बन गया है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने दावों पर मजबूती से डटे हुए हैं। आने वाले संसद सत्र यह तय कर सकते हैं कि यह विवाद कितना बढ़ता है।


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