कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ कानूनी सुरक्षा को मजबूत कर सकने वाले एक अहम फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बॉलीवुड अभिनेत्री प्रीति जिंटा को अंतरिम राहत दी है और प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्मों को उनकी पहचान का कथित तौर पर दुरुपयोग करने वाले एआई-जनित डीपफेक, मॉर्फ की गई तस्वीरें और अन्य अनधिकृत सामग्री हटाने या उन तक पहुंच अवरुद्ध करने का निर्देश दिया है। इस आदेश को भारत में व्यक्तित्व अधिकारों (पर्सनैलिटी राइट्स) से जुड़े विकसित होते कानूनी ढांचे में एक और महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
यह मामला अभिनेत्री द्वारा हाई कोर्ट का रुख करने के बाद दायर किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनकी सहमति के बिना बनाए गए हेराफेरी वाले वीडियो, एआई-जनित दृश्य, फर्जी तस्वीरें और डिजिटल रूप से बदली गई सामग्री होस्ट कर रहे थे। याचिका के अनुसार, ऐसी सामग्री के प्रसार ने उनके व्यक्तित्व अधिकारों, प्रचार अधिकारों और नैतिक अधिकारों का उल्लंघन किया और फिल्म उद्योग में दो दशक से अधिक समय में बनाई गई उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति माधव जामदार ने कहा कि किसी व्यक्ति की छवि का इस्तेमाल कर बनाई गई अनधिकृत एआई-जनित सामग्री मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन कर सकती है। अदालत ने गूगल, मेटा, यूट्यूब और X समेत प्लेटफॉर्मों को आदेश में निर्धारित समय के भीतर अभिनेत्री द्वारा चिह्नित निर्दिष्ट लिंक हटाने या उन तक पहुंच निष्क्रिय करने का निर्देश दिया।
कार्यवाही के दौरान अदालत ने एआई-जनित सामग्री से निपटने में सोशल मीडिया मध्यस्थों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तब निष्क्रिय नहीं रह सकते जब उनकी सेवाओं का कथित तौर पर ऐसी हेराफेरी वाली सामग्री फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पहचान को नुकसान पहुंचाती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसी सामग्री के खिलाफ त्वरित कार्रवाई उभरती तकनीकों के आगे दुरुपयोग को रोकने में मदद करेगी।
अदालत के समक्ष पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, मुकदमे में प्रीति जिंटा से जुड़ी एआई-जनित या डिजिटल रूप से हेराफेरी की गई सामग्री वाले करीब 275 ऑनलाइन लिंक चिह्नित किए गए। अभिनेत्री ने तर्क दिया कि ये वीडियो और तस्वीरें उनकी पहचान को झूठे तरीके से पेश करती हैं और दर्शकों को गुमराह करने के साथ-साथ उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।
हाई कोर्ट ने कहा कि प्रीति जिंटा ने 25 वर्ष से अधिक लंबे और 40 से अधिक फिल्मों वाले करियर के जरिए एक मजबूत सार्वजनिक पहचान स्थापित की है। अदालत ने कहा कि उस पहचान का कोई भी अनधिकृत व्यावसायिक या डिजिटल दोहन कानूनी सुरक्षा का हकदार है, खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में जहां हेराफेरी वाली सामग्री कई प्लेटफॉर्मों पर तेजी से फैल सकती है।
यह आदेश प्रीति जिंटा को भारतीय फिल्म हस्तियों की उस बढ़ती सूची में जोड़ता है, जिन्होंने अपने नाम, तस्वीरों और डिजिटल रूप से बनाई गई सामग्री के दुरुपयोग के खिलाफ न्यायिक सुरक्षा मांगी है। हाल के वर्षों में कई हस्तियों ने डीपफेक, फर्जी विज्ञापनों और एआई-जनित प्रतिरूपण के खिलाफ सुरक्षा की मांग करते हुए अदालतों का रुख किया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर मनोरंजन उद्योग से आगे तक हो सकता है। जैसे-जैसे एआई उपकरण तेजी से सुलभ होते जा रहे हैं, पहचान की चोरी, गढ़े गए वीडियो और गलत सूचना को लेकर चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। अदालतों से अब तकनीकी नवाचार को व्यक्तिगत अधिकारों के साथ संतुलित करते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जिम्मेदारियां परिभाषित करने को कहा जा रहा है।
यह अंतरिम आदेश मुकदमे के अंतिम गुण-दोष का फैसला नहीं करता। मामला बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष जारी रहेगा, जहां अंतिम फैसला सुनाए जाने से पहले पक्ष विस्तृत दलीलें पेश करेंगे। फिलहाल अदालत का निर्देश यह सुनिश्चित करता है कि मामला आगे बढ़ने के दौरान याचिका में चिह्नित विवादित सामग्री को हटा दिया जाए।
यह मामला एआई-जनित सामग्री और व्यक्तित्व अधिकारों पर भारत के विकसित होते न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनने की उम्मीद है। डीपफेक तकनीक के लगातार परिष्कृत होते जाने के साथ कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि यह फैसला मजबूत डिजिटल सुरक्षा उपायों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों से अधिक जवाबदेही की बढ़ती जरूरत को उजागर करता है।


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