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गुरुवार, 17 सितंबर 2026
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समझिए: ब्रिक्स का 'न्यू दिल्ली घोषणापत्र' क्या है और भारत की मेजबानी में शिखर सम्मेलन से क्या निकला

12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से घोषणापत्र अपनाया गया। जानिए इसकी मुख्य बातें और सीमाएं।

समझिए: ब्रिक्स का 'न्यू दिल्ली घोषणापत्र' क्या है और भारत की मेजबानी में शिखर सम्मेलन से क्या निकला
2016 में गोवा में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के नेता (फाइल फोटो) — फोटो: Presidential Press and Information Office (kremlin.ru) / Wikimedia Commons (CC BY 4.0)

नई दिल्ली | भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित हुआ। सम्मेलन के पहले ही दिन सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से 'न्यू दिल्ली घोषणापत्र' स्वीकार कर लिया। पश्चिम एशिया के युद्ध जैसे मुद्दों पर सदस्यों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए इसे मेजबान भारत के लिए कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

ब्रिक्स क्या है?

ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने की थी। दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम ब्रिक्स पड़ा। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया भी इसमें शामिल हुए। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और करीब 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है।

सम्मेलन की थीम और मौजूदगी

इस बार की थीम 'बिल्डिंग फॉर रेज़िलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' रखी गई। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई नेता सम्मेलन में पहुंचे।

घोषणापत्र की मुख्य बातें

  • पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई गई और सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की गई, हालांकि किसी देश का नाम नहीं लिया गया।
  • एकतरफा टैरिफ की आलोचना की गई, लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया।
  • नागरिक ढांचे और आईएईए सुरक्षा उपायों वाले शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों को लेकर चिंता जताई गई।
  • संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार और आतंकवाद की निंदा जैसे विषय भी शामिल रहे।

भारत का रुख

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है और ग्लोबल साउथ को केवल नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम गढ़ने वाला बनना चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक भारत ने पर्दे के पीछे ईरान और यूएई जैसे विरोधी पक्षों के बीच सहमति बनाने में अहम भूमिका निभाई।

सीमाएं भी दिखीं

कई विश्लेषकों का मानना है कि सहमति तो बनी, लेकिन बेहद सामान्य भाषा के सहारे। पिछले साल के रियो सम्मेलन के बयान की तुलना में इस बार भाषा नरम रही। यानी ब्रिक्स कठिन मुद्दों पर बातचीत जारी रखने का मंच तो है, पर जिम्मेदारी तय करने या साझा कार्रवाई पर आम राय बनाना उसके लिए अब भी चुनौती है। भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी संतुलनकारी विदेश नीति दिखाने का अवसर रहा।

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एक्सप्लेनर डेस्क · संपादकीय डेस्क

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