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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026
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सत्य निकेतन हादसा: छात्रों के 'पीजी' और पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर अब टालमटोल नहीं चलेगी

दिल्ली में छात्रों के रहने वाली पांच मंजिला इमारत गिरने से कम से कम सात लोगों की मौत ने शहरों में किराये के आवास की सुरक्षा पर फिर सवाल खड़े किए हैं।

सत्य निकेतन हादसा: छात्रों के 'पीजी' और पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर अब टालमटोल नहीं चलेगी
दिल्ली का सत्य निकेतन इलाका, दुर्गाबाई देशमुख मेट्रो स्टेशन से दृश्य — फोटो: HARSH RAWAT / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

एजेंडा पोस्ट विचार डेस्क | दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 6 सितंबर 2026 को एक बेसमेंट सहित पांच मंजिला इमारत ढह गई। समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार इस हादसे में कम से कम सात लोगों की जान गई। यह इमारत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पास है और स्थानीय मीडिया के मुताबिक इसमें छात्र रहते थे। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि मरम्मत कार्य के कारण बेसमेंट में पानी जमा होने से पुरानी इमारत गिर गई। पुलिस इमारत के मालिक की तलाश में जुटी थी।

यह सिर्फ एक हादसा नहीं

सत्य निकेतन जैसे इलाके देश भर से आए सैकड़ों विद्यार्थियों का ठिकाना हैं। कम किराये और कॉलेज की नजदीकी के कारण छात्र अक्सर भीड़भाड़ वाले, पुराने मकानों में रहने को मजबूर होते हैं। रिपोर्टों में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत के घने शहरी इलाकों में अनधिकृत निर्माण आम है और कानून का पालन ढीला रहता है। यानी खतरा किसी एक इमारत तक सीमित नहीं है।

जिम्मेदारी किसकी?

  • मकान मालिक: मरम्मत या ढांचे में बदलाव के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन और किरायेदारों की जान की हिफाजत पहली जिम्मेदारी है।
  • स्थानीय निकाय: पुरानी इमारतों का संरचनात्मक ऑडिट, बिना अनुमति बनी मंजिलों पर कार्रवाई और बेसमेंट के इस्तेमाल की निगरानी उनका काम है।
  • व्यवस्था की खामी: निरीक्षण के लिए कर्मचारियों की कमी और पुराने नियमों की जटिलता भी एक सच्चाई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

संतुलित समाधान की जरूरत

ऐसे हादसों के बाद अक्सर सख्त सीलिंग और तोड़फोड़ की मांग उठती है। लेकिन बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बड़े पैमाने पर कार्रवाई से छात्रों के सामने रहने का संकट खड़ा हो सकता है और किराये बढ़ सकते हैं। इसलिए जरूरत चरणबद्ध और पारदर्शी कदमों की है। छात्र आवास वाली इमारतों का अनिवार्य पंजीकरण, समय-समय पर संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणपत्र, और यह जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो कि कौन-सी इमारत सुरक्षित घोषित है। विश्वविद्यालय भी छात्रावास क्षमता बढ़ाकर और सुरक्षित आवास की सूची जारी करके मदद कर सकते हैं।

सबक याद रखना होगा

हर बड़े हादसे के बाद जांच और मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद ध्यान हट जाता है। सत्य निकेतन की घटना की निष्पक्ष जांच से जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि दिल्ली ही नहीं, कोटा, प्रयागराज, पटना और आगरा जैसे शहरों में भी, जहां बड़ी संख्या में छात्र किराये पर रहते हैं, पुरानी इमारतों की सुरक्षा जांच को प्राथमिकता दी जाए। पढ़ाई के लिए घर छोड़ने वाले किसी भी युवा की जान असुरक्षित छत के नीचे नहीं जानी चाहिए।

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विचार डेस्क · संपादकीय डेस्क

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