एजेंडा पोस्ट विचार डेस्क | 15 सितंबर 2026 को पटना में सैकड़ों प्रतियोगी छात्र गांधी मैदान से मार्च करते हुए सड़कों पर उतरे। उनकी मुख्य मांग है कि बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग की 1,799 सब-इंस्पेक्टर पदों की भर्ती परीक्षा रद्द कर पारदर्शी तरीके से दोबारा कराई जाए। साथ ही बीपीएससी की 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा रद्द करने, भर्ती कैलेंडर जारी करने और परीक्षा नियमों में बदलाव की मांग भी उठी। जेपी गोलंबर के पास पुलिस से झड़प हुई, कुछ प्रदर्शनकारी रेल पटरी तक पहुंचे और पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया।
गुस्से की जड़ क्या है?
किसी भी राज्य में सरकारी नौकरी की परीक्षा लाखों परिवारों की उम्मीद होती है। अभ्यर्थी वर्षों तैयारी करते हैं, कोचिंग और किराये पर खर्च करते हैं। ऐसे में अनियमितता का आरोप लगते ही पूरी प्रक्रिया पर संदेह पैदा होता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) दारोगा परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच कर रही है और कुछ केंद्रों के सैकड़ों अभ्यर्थियों के परिणाम जांच के दायरे में हैं। यानी आरोपों को पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता, लेकिन जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा।
दो पक्ष, दोनों की अपनी दलील
- परीक्षा रद्द करने के पक्ष में: अगर गड़बड़ी व्यापक है तो उसी परिणाम पर नियुक्ति देना ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा।
- रद्द करने के विरोध में: जिन उम्मीदवारों ने ईमानदारी से परीक्षा दी और पास हुए, उनके लिए पूरी परीक्षा रद्द होना भी नुकसान है। दोबारा परीक्षा से समय और संसाधन भी लगते हैं।
इसलिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही दिखता है कि जांच तेज, निष्पक्ष और समयबद्ध हो तथा उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं, ताकि फैसला तथ्यों पर आधारित हो, दबाव पर नहीं।
सड़क पर टकराव किसी के हित में नहीं
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है और युवाओं की चिंता वाजिब हो सकती है। लेकिन रेल ट्रैक रोकना या प्रतिबंधित क्षेत्रों में घुसना आम नागरिकों को परेशानी में डालता है और आंदोलन की विश्वसनीयता भी घटाता है। दूसरी ओर प्रशासन के लिए भी जरूरी है कि छात्रों से संवाद का रास्ता खुला रखे और बल प्रयोग न्यूनतम हो। बातचीत की कमी अक्सर अविश्वास को और गहरा करती है।
आगे का रास्ता
देश में पिछले कुछ वर्षों में कई परीक्षाओं पर पेपर लीक और गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इसका स्थायी इलाज केवल एक परीक्षा रद्द करना नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारना है: प्रश्नपत्रों की सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था, परीक्षा केंद्रों की सख्त निगरानी, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और पहले से घोषित भर्ती कैलेंडर। जब अभ्यर्थियों को भरोसा होगा कि परीक्षा समय पर और साफ-सुथरे तरीके से होगी, तभी सड़कों का गुस्सा कम होगा। बिहार के आयोगों और सरकार के सामने अभी यही असली परीक्षा है।


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