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गुरुवार, 17 सितंबर 2026
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मुला और इंद्रायणी में मरती मछलियां: शहरी नदियों का प्रदूषण अब चेतावनी नहीं, आपातकाल है

पुणे के पास कुछ ही दिनों के अंतराल में दो नदियों में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत ने अपशिष्ट जल प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

मुला और इंद्रायणी में मरती मछलियां: शहरी नदियों का प्रदूषण अब चेतावनी नहीं, आपातकाल है
आलंदी (पुणे) में इंद्रायणी नदी का घाट — फोटो: Universalashic / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

एजेंडा पोस्ट विचार डेस्क | महाराष्ट्र के पुणे जिले से आई दो खबरें चिंता बढ़ाने वाली हैं। 12 सितंबर 2026 को पिंपले निलख इलाके में मुला नदी में बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां पानी पर तैरती दिखीं। इसके कुछ ही दिनों बाद संत ज्ञानेश्वर की समाधि के लिए प्रसिद्ध आलंदी के पास इंद्रायणी नदी में भी बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत की सूचना आई। दोनों जगह प्रदूषित पानी को संभावित कारण बताया जा रहा है।

क्या हैं आरोप?

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कुछ अवैध कारखानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से बिना शोधन का रासायनिक और गंदा पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। उनका अनुमान है कि इससे पानी में घुली ऑक्सीजन तेजी से घटी और मछलियां मर गईं। हैरानी की बात यह है कि मानसून में जब नदी का बहाव तेज होता है, तब भी ऐसा हुआ। हालांकि ठोस कारण पानी के नमूनों की प्रयोगशाला जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

आस्था और स्वास्थ्य, दोनों पर असर

इंद्रायणी वारकरी परंपरा में पवित्र मानी जाती है। देहू और आलंदी के घाटों पर हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान करते हैं। ऐसे में नदी में बैक्टीरिया, नाइट्रेट और रसायनों की मौजूदगी सीधे लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती है। मुला नदी किनारे रहने वाले लोगों ने भी दुर्गंध और बीमारी फैलने की आशंका जताई है।

दोष किसका, समाधान क्या?

ऐसे मामलों में अक्सर उद्योग, नगर निकाय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं। सच यह है कि तेजी से फैलते शहरों में सीवेज शोधन क्षमता आबादी के साथ नहीं बढ़ी, और छोटे उद्योगों की निगरानी कमजोर है। दूसरी ओर उद्योगों का तर्क रहता है कि उन्हें साझा शोधन संयंत्र जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। समाधान किसी एक पक्ष पर दोष डालने से नहीं निकलेगा।

  • नदी में गिरने वाले नालों और औद्योगिक निकासी की रियल-टाइम जल गुणवत्ता निगरानी और उसके आंकड़े सार्वजनिक हों।
  • सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की वास्तविक कार्यक्षमता का स्वतंत्र ऑडिट हो।
  • दोषी पाए जाने वाले प्रतिष्ठानों पर पर्यावरण कानूनों के तहत समयबद्ध कार्रवाई हो।
  • छोटे उद्योगों के लिए साझा अपशिष्ट शोधन की व्यवस्था पर निवेश किया जाए।

यमुना किनारे बसे शहरों के लिए भी सबक

पुणे की घटनाएं अकेली नहीं हैं। आगरा समेत देश के कई शहर यमुना और दूसरी नदियों में गिरते गंदे पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। मछलियों की सामूहिक मौत एक तरह का अलार्म है, जो बताता है कि नदी का पारिस्थितिक तंत्र टूटने के कगार पर है। इस संकेत को अनसुना करना आने वाले समय में कहीं बड़ी कीमत वसूल सकता है।

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विचार डेस्क · संपादकीय डेस्क

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