नई दिल्ली | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सप्ताह होने वाली ऑस्ट्रेलिया यात्रा के प्रमुख नतीजों में एक लंबे समय से प्रतीक्षित यूरेनियम आपूर्ति समझौता शामिल रहने की उम्मीद है, जो ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करने के भारत के प्रयासों में एक और कदम है।
चर्चाओं से परिचित सरकारी अधिकारियों ने बताया कि दोनों देश भारत को यूरेनियम निर्यात के वाणिज्यिक ढांचे को अंतिम रूप देने पर काम कर रहे हैं। प्रस्तावित समझौते से नई दिल्ली की उन योजनाओं को समर्थन मिलने की उम्मीद है जिनके तहत देश विश्वसनीय, कम-कार्बन बिजली स्रोतों की तलाश में अपनी बिजली व्यवस्था में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2014 में एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे यूरेनियम व्यापार का रास्ता खुला। हालांकि दोनों पक्ष नियामक और परिचालन संबंधी व्यवस्थाओं पर काम करते रहे, इस दौरान वाणिज्यिक आपूर्ति सीमित बनी रही। अधिकारियों का अब मानना है कि बातचीत उन्नत चरण में पहुंच गई है, जिससे उम्मीदें बढ़ी हैं कि प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान समझौते की घोषणा हो सकती है।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम उत्पादकों में से एक है, जो इसे भारत के लिए एक रणनीतिक साझेदार बनाता है, क्योंकि देश अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ा रहा है। सरकार ने कार्बन उत्सर्जन घटाते हुए बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने की अपनी दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा रणनीति के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में परमाणु ऊर्जा को चिह्नित किया है।
ऊर्जा सहयोग के अलावा, प्रधानमंत्री मोदी के ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ महत्वपूर्ण खनिजों, रक्षा सहयोग, साइबर सुरक्षा, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं और निवेश पर व्यापक बातचीत करने की उम्मीद है। दोनों नेता भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत हुई प्रगति की समीक्षा भी कर सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि यूरेनियम आपूर्ति समझौता द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करेगा, साथ ही भारत को अपने बढ़ते परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए ईंधन आपूर्ति को लेकर अधिक निश्चितता प्रदान करेगा। यदि इसे अंतिम रूप दिया जाता है, तो यह समझौता हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा पहलों में से एक होगा।



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