नई दिल्ली | यूपीआई भुगतान पर शुल्क को लेकर केंद्र सरकार की ताजा अधिसूचना पर राजनीति गरमा गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार, 15 सितंबर को आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने चुपचाप यूपीआई पर फीस लगाने का दरवाजा खोल दिया है। वहीं भाजपा ने इन आरोपों को भ्रम फैलाने वाला बताते हुए कांग्रेस पर पलटवार किया।
क्या है मामला
रिपोर्टों के अनुसार, 14 सितंबर को जारी अधिसूचना में बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन और रुपे डेबिट कार्ड भुगतान पर कोई शुल्क न लेने का निर्देश दिया गया है। विपक्ष का कहना है कि इससे 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने की गुंजाइश बन गई है, जबकि अब तक यूपीआई लेनदेन राशि की परवाह किए बिना मुफ्त थे। बताया गया है कि इसके लिए संसद के मानसून सत्र में भुगतान एवं निपटान प्रणाली कानून में संशोधन पारित हुआ था।
राहुल गांधी के आरोप
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार भले ही कह रही हो कि ग्राहकों से शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन दुकानदारों पर लगने वाली फीस अंततः कीमतों में जुड़कर ग्राहकों की जेब से ही वसूली जाएगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे झुककर यह कदम उठाया है, क्योंकि अमेरिकी भुगतान कंपनियां भारत की शून्य एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इसे सरकार का बड़ा यू-टर्न करार दिया।
सरकार और भाजपा का पक्ष
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि आम उपयोगकर्ताओं के लिए यूपीआई भुगतान मुफ्त रहेंगे और यदि कोई एमडीआर लगता है तो वह व्यापारियों पर होगा, उपभोक्ताओं पर नहीं। सरकार का कहना है कि छोटे व्यापारी और छोटे मूल्य के लेनदेन शुल्क से बाहर रहेंगे।
भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस शुरू से प्रधानमंत्री मोदी की डिजिटल भुगतान क्रांति का विरोध करती रही है। उनका आरोप है कि यूपीआई की सफलता और देश की आर्थिक प्रगति से नाराज होकर विपक्ष गलत जानकारी फैला रहा है।
दोनों पक्षों के मुख्य तर्क
- कांग्रेस: मर्चेंट पर लगने वाला शुल्क अंततः ग्राहकों तक पहुंचेगा
- सरकार: आम उपयोगकर्ताओं और छोटे लेनदेन पर कोई सीधा बोझ नहीं पड़ेगा
डिजिटल भुगतान के मामले में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में है, ऐसे में यूपीआई से जुड़ा कोई भी बदलाव आम लोगों और कारोबारियों दोनों के लिए संवेदनशील मुद्दा बना रहता है।


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